Tuesday, November 6, 2018

शिवराज के शासन में कौड़ी के भाव लहसुन, तबाह होते किसान

लिनाय प्रांत से मौजूदा कांग्रेस में डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य राजा कृष्णमूर्ति भी फिर से मैदान में हैं, जहां उनके प्रतिद्वंदी रिपब्लिकन पार्टी के भारतीय मूल के ही जीतेंद्र दिगांकर हैं. इन सभी डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों के जीतने की अच्छी संभवनाएं हैं.
इसके अलावा भारतीय मूल के अमरीकी स्री प्रेस्टन कुलकर्णी ने अमरीकी विदेश सेवा की नौकरी छोड़कर राजनीति में प्रवेश किया और अब वो टेक्सस से कांग्रेस के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव लड़ रहे हैं.
फ़्लोरिडा में संजय पटेल डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार हैं जो मौजूदा कांग्रेस सदस्य बिल पोसी के ख़िलाफ़ मैदान में हैं. कनेक्टीकट प्रांत में एक मात्र भारतीय मूल के रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार हैरी अरोड़ा डेमोक्रैट जिम हाइम्स के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, लेकिन डेमोक्रेटिक उम्मीदवार इस सीट से पिछले 10 साल से चुनाव जीत रहे हैं.
हैरी अरोड़ा को फिर भी उम्मीद है कि वोटर अब उनको भी मौक़ा दे सकते हैं. हैरी अरोड़ा कहते हैं, "मुझे तो सभी तरह के लोग समर्थन दे रहे हैं. हमारे क्षेत्र में अधिकतर लोग चाहते हैं कि उनके मुद्दों को सुलझाने के लिए काम किया जाए न कि बस टालमटोल करके बात इधर की उधर कर दी जाए. मेरा तरीक़ा यह है कि कैसे मामले सुलझाए जाएं, उसके बारे में पूरी योजना सामने रखें न कि सिर्फ़ उन पर बात करके आगे बढ़ जाएं."
एक मात्र भारतीय मूल के आज़ाद उम्मीदवार शिवा अय्यादुराई भी सीनेट की सीट के लिए मैसाचुसेट्स प्रांत में चुनावी मैदान में हैं और उनके सामने हैं डेमोक्रेटिक पार्टी की दिग्गज नेता और मौजूदा सीनेटेर एलीज़ाबेथ वॉरेन.
अब ऐसे में शिवा अय्यादुराई के जीतने की कोई संभावना नज़र नहीं आती. उम्मीद की जा रही है कि एलीज़ाबेथ वॉरेन सन 2020 में डेमोक्रेटिक पार्टी की राष्ट्रपति पद के चुनाव में उम्मीदवार हो सकती हैं. अमरीकी कांग्रेस के चुनाव के अलावा भारतीय मूल के दर्जनों लोग प्रांतीय और स्थानीय चुनावों में भी भाग ले रहे हैं.
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों ये ख़ास प्रयोग हो रहे हैं.
यहां सियासत में खुद को सफल बनाने और जनता से जुड़े रहने के लिए राजघरानों और ज़मींदारों की नई पीढ़ी नए-नए तरीके आजमा रही है.
मध्य प्रदेश की राजनीति की गहरी समझ रखने वाले पत्रकार दीपक तिवारी कहते हैं कि अंग्रेज़ चले गए लेकिन हिंदुस्तान में राजे-रजवाड़े रह गए.
वो कहते हैं, "देसी रियासतों के भारत में विलय के बाद कई राज परिवारों ने लोकतंत्र के जरिए जनता पर शासन करने की नीति पर काम किया और काफ़ी हद तक इसमें सफल भी रहे."
ख़ास तौर पर मध्य प्रदेश में राज परिवारों, जागीरदारों और ज़मींदारों को ख़ूब चुनावी सफलता मिली.
दीपक तिवारी बताते हैं कि इमरजेंसी के बाद भाजपा ने कांग्रेस के ख़िलाफ़ ज़मीन तैयार करने के लिए राजघरानों को राजनीति में बहुत अवसर दिए. कांग्रेस ने भी ऐसा ही किया. यही वजह रही कि सिंधिया परिवार लगातार प्रदेश की राजनीति का केंद्र रहा तो चुरहट के अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बने.
फिर राघोगढ़ के राजपरिवार से आए दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. इनके अलावा गोविंद नारायण सिंह और राजा नरेशचंद्र सिंह भी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे.
आज भी मध्य प्रदेश में राज परिवारों से जुड़े दो सांसद और कई विधायक हैं.
विंध्य और बुंदेलखंड इलाके में अभी भी सियासत राजपरिवारों और ज़मींदारों के इर्द-गिर्द ही घूमती है.
वरिष्ठ पत्रकार विनय द्विवेदी नामी परिवारों के राजनीति में आने की वजह बताते हैं.
वो कहते हैं, "ग्वालियर, राघोगढ़, रीवा, नरसिंहगढ़, चुरहट, खिचलीपुर, देवास, दतिया, छतरपुर, देवास और पन्ना जैसे छोटे-बड़े राजघराने मध्य प्रदेश प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे और सफल भी."
उन्होंने कहा, ''दरअसल आज़ादी के बाद लोकतंत्र में भी ये राज परिवार सरकार द्वारा मिली संपत्तियों से धनी ही बने रहे. इसके साथ ही अपने अपने क्षेत्र में प्रभाव के चलते बड़ी संख्या में आम लोगों का जुड़ाव इनसे रहा. इसी का इस्तेमाल करते हुए इन परिवारों ने राजनीति में जब भी कदम रखा तो ज़्यादातर सफल ही हुए."देलखंड के युवा पत्रकार कृष्णकांत नगाइच कहते हैं, "हमने राजशाही का बीता दौर तो नहीं देखा लेकिन आज भी ग्रामीण क्षेत्र की जनता इन परिवारों के लोगों के लिए राजा साहब, महाराज, हुकुम, कुंवर सा और रानी सा जैसे सम्बोधनों का इस्तेमाल करती है."
लेकिन ज़माना बदला भी है. ख़ास तौर पर बीते एक दशक में मोबाइल क्रांति से ग्रामीण क्षेत्र की जनता में जागरूकता आई है. अब यही जनता इन राजपरिवारों को सियासत में तो देखना चाहती है लेकिन आम नेता की तरह.
सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन का मानना है कि लोकतंत्र में आए इस बदलाव में ख़ास तौर पर युवा हैं. वो कहते हैं, ''युवा चाहते हैं कि अगर कोई राज परिवार या पुराने ज़मींदार परिवार से है तो भी वह सामान्य राजनैतिक व्यक्ति की तरह जनता से मिले न कि अपने इतिहास की वजह से.''

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