डरकवड़ा से निकलकर यवतमाल ज़िला मुख्यालय के कलेक्ट्रेट दफ़्तर में हम
अब तक इकट्ठा हुए सवालों के जवाब ढूंढने पहुंचे. यहां पदस्त रेसीडेंट
डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर नरेंद्र फुलझले शिवाजी महाराज के नाम पर शुरू की गयी
कर्ज़ माफ़ी योजना के ठीक से लागू न किए जाने के बारे में पूछने पर
‘बलिराजा चेतना अभियान’ और ‘प्रेरणा प्रकल्प’ नामक दो नई सरकारी योजनाओं का
ज़िक्र करते हैं.
यह दो नई योजनाएं महाराष्ट्र सरकार ने किसान कल्याण को बढ़ाने और आत्महत्याओं को रोकने के लिए शुरू की है. यहां किसानों में डिस्ट्रेस तो है. यह तनाव कभी आर्थिक होता है, कभी सामाजिक तो कभी भावनात्मक. यहां के लोग बहुत भावुक भी हैं. मैं यहीं का रहने वाला हूँ इसलिए मैं जानता हूँ कि यहां लोग ज़रा ज़रा सी बातों को दिल पर ले लेते हैं. बाक़ी अगर परिवार बढ़ता रहे और ज़मीन उतनी ही रहे तो मुश्किल तो होगी ही”.
आगे न्यूनतम समर्थन मूल्य के किसानों तक न पहुँच पाने के सवाल पर उन्होंने कहा, “किसी भी व्यापार की तरह खेती में भी अगर एक हज़ार का निवेश हो तो आदमी कम से कम 1100 रुपये कमाने की कोशिश करेगा. यह छोटा सा मुनाफ़ा भी आज किसानों को नहीं हो रहा. यह आत्महत्याओं के पीछे बड़ी वजह है. बाक़ी सरकार अपनी तरफ़ से सारे प्रयास कर रही है. कर्ज़ा माफ़ी और पानी के संचयन से लेकर किसानों की मानसिक स्थिति को सुधारने पर भी ध्यान दिया जा रहा है”. ज़िला अधिकारी के दफ़्तर से कुछ ही दूरी पर हमारी मुलाक़ात ‘प्रेरणा प्रकल्प’ योजना के तहत किसानों की मानसिक स्थिति पर काम करने वाले मनोचिकित्सक सरफ़राज सौदागर से होती है.
सरफ़राज बताते हैं कि इस योजना का मक़सद महराष्ट्र में हो बढ़ रही किसान आत्महत्याओं को रोकने के लिए मनोचिकित्सकीय हस्तक्षेप करने का है. बीते 2 सालों में हमने यवतमाल और ओसमनीयबाद – जो कि किसान आत्महत्या के मामले में हाई रिस्क जिले माने जाते हैं- यहां 3350 किसानों का इलाज किया है.
इलाज ख़त्म होने के बाद किसी ने भी सुसाइड करने की कोशिश नहीं की. वरना आम तौर पर ऐसे मामलों में ‘रीपीट अटेम्प्ट’ का ख़तरा बहुत रहता है. हमारा काम डिप्रेशन का शिकार किसानों को ढूँढना और इलाज के ज़रिए उन्हें ज़िंदगी के प्रति फिर आशान्वित करना है”.
सरफ़राज अपना यह काम आशा और ट्रेन किए गए अपनी टीम के सदस्यों के साथ मिलकर करते हैं. लेकिन क़र्ज़ की परेशानी दूर करने का उनके पास भी कोई उपाय नहीं.
“हम उन्हें सुसाइड करने की बजाय संघर्ष करके क़र्ज़ माफ़ करवाने और वापस अपने पैरों पर खड़े होने के लिए तैयार करने की कोशिश करते हैं”.
यह दो नई योजनाएं महाराष्ट्र सरकार ने किसान कल्याण को बढ़ाने और आत्महत्याओं को रोकने के लिए शुरू की है. यहां किसानों में डिस्ट्रेस तो है. यह तनाव कभी आर्थिक होता है, कभी सामाजिक तो कभी भावनात्मक. यहां के लोग बहुत भावुक भी हैं. मैं यहीं का रहने वाला हूँ इसलिए मैं जानता हूँ कि यहां लोग ज़रा ज़रा सी बातों को दिल पर ले लेते हैं. बाक़ी अगर परिवार बढ़ता रहे और ज़मीन उतनी ही रहे तो मुश्किल तो होगी ही”.
आगे न्यूनतम समर्थन मूल्य के किसानों तक न पहुँच पाने के सवाल पर उन्होंने कहा, “किसी भी व्यापार की तरह खेती में भी अगर एक हज़ार का निवेश हो तो आदमी कम से कम 1100 रुपये कमाने की कोशिश करेगा. यह छोटा सा मुनाफ़ा भी आज किसानों को नहीं हो रहा. यह आत्महत्याओं के पीछे बड़ी वजह है. बाक़ी सरकार अपनी तरफ़ से सारे प्रयास कर रही है. कर्ज़ा माफ़ी और पानी के संचयन से लेकर किसानों की मानसिक स्थिति को सुधारने पर भी ध्यान दिया जा रहा है”. ज़िला अधिकारी के दफ़्तर से कुछ ही दूरी पर हमारी मुलाक़ात ‘प्रेरणा प्रकल्प’ योजना के तहत किसानों की मानसिक स्थिति पर काम करने वाले मनोचिकित्सक सरफ़राज सौदागर से होती है.
सरफ़राज बताते हैं कि इस योजना का मक़सद महराष्ट्र में हो बढ़ रही किसान आत्महत्याओं को रोकने के लिए मनोचिकित्सकीय हस्तक्षेप करने का है. बीते 2 सालों में हमने यवतमाल और ओसमनीयबाद – जो कि किसान आत्महत्या के मामले में हाई रिस्क जिले माने जाते हैं- यहां 3350 किसानों का इलाज किया है.
इलाज ख़त्म होने के बाद किसी ने भी सुसाइड करने की कोशिश नहीं की. वरना आम तौर पर ऐसे मामलों में ‘रीपीट अटेम्प्ट’ का ख़तरा बहुत रहता है. हमारा काम डिप्रेशन का शिकार किसानों को ढूँढना और इलाज के ज़रिए उन्हें ज़िंदगी के प्रति फिर आशान्वित करना है”.
सरफ़राज अपना यह काम आशा और ट्रेन किए गए अपनी टीम के सदस्यों के साथ मिलकर करते हैं. लेकिन क़र्ज़ की परेशानी दूर करने का उनके पास भी कोई उपाय नहीं.
“हम उन्हें सुसाइड करने की बजाय संघर्ष करके क़र्ज़ माफ़ करवाने और वापस अपने पैरों पर खड़े होने के लिए तैयार करने की कोशिश करते हैं”.
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